आत्म ज्ञान
आत्म ज्ञान एक ऐसा ज्ञान है। जो इसे पा ले, उसने सब कुछ पा लिया। इंसान यह सब कुछ भूल गया है की वह इस लोक में क्यों आया है उसे क्या करना है और कैसे करना है। यह सब कुछ भूल कर यह नासवान जीवन का मुख्या उद्देश्य भूल गया।
इस संसार में सिर्फ वह आपने सुआरत के लिए वह कुछ भी कर सकता है। आपने इच्छा को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। चाहे सही हो य गलत जब इंसान अपनी इच्छा को पूरी करने के तत पर रहता है, तो उसे सही और गलत का ज्ञान नहीं रहता है। वह उसे आपने धर्म मानकर करता रहता है । मगर असल में ऐसा कुछ नहीं है जो आपने सुआरत के लिए जीता है, तो वह एक सूअर की जिंदगी जीता है। धर्म नहीं कह जाता यह अधर्म बन जाता है।
अधर्म एक अंधकार की तरह होता है। आंख होने के बाद भी नहीं देख पाता। वह अंधकार के रूप में अपना जीवन वितीत करता है । फिर वह पाप का रास्ता अपनाता है पाप की पॉटरी बांध कर चलता है।